
एक ऐसा देश जहाँ अतिथि को देवता मान कर पूजा जाता था ... ऐसे देश में जनम लेने वाले हम भारतवासियों को क्या होता जा रहा है हम क्यों हर पल अपनों से ही दूर होते जा रहे है ... या क्यों हमारे अपने ही हमे अपने से दूर करते जा रहे है ... क्या आप को भी ऐसा महसूस होता है .... क्या कभी - कभी होता है ... रिश्ते क्यों ऐसा रूप लेते जा रहे है जिन्हें निभाना कठिन सा लगने लगता है.... क्यों एक दूसरे का साथ हमे आज़ादी में खलल सा महसूस होता है ....मना की ज़माना बदल गया है पर यह पहली दफा तो हो नहीं रहा है... यह तो ज़माने का दस्तूर है ... परिवर्तन तो होते ही रहे है और होते भी रहेंगे ... पर क्या ऐसा परिवर्तन अच्छा है ? यह सोचने का विषय है ...क्या कुछ अच्छा सोचने के लिए भी हमारे पास समय है ... या बस दो वक़्त की रोटी ही इतनी महँगी हो गयी है की ना तो हम कमा पा रहे है ना ही खिला पा रहे है .... नहीं हमे व्यक्तिगत जीवन ज्यादा रुचिकर लगने लगा है ... हमें अपनों का साथ अब साथ ना लगकर खलल लगता है हम अपनों को प्यार करते है चाहते है लेकिन उसकी भी अब सीमाए होने लगी है ... क्या आपको वो दिन याद है या क्या आप उस ज़माने से गुज़रे है जब तीज त्योहारों पर घर की बनी मिठाई या पकवान लोग एक दूसरे के घर ... अपनों के घर भेजा करते थे ... या ख़ुशी या गम के दौरान लोग साथ देने में पीछे नहीं हटते थे । मानता हूँ की अब समय कम होता जा रहा है ... पर क्यों क्या समय की घडी तेज चलने लगी है या हम धीमे हो गए है ... सब कुछ सोचना जरूरी है.... वो दिन आ गया है जब माँ तो चाहिए पर ऐसी जो हमारी व्यक्तिगत जिंदगी से जरा दूर ही रहे ... पिता तो चाहिए पर ऐसे जो हमारी किताबो को पलट कर ना देखे ... भाई तो चाहिए पर ऐसा जो हम पर निगरानी ना रखे ... और बहन हो तो ऐसी जो हर गलती को पापा मम्मी से छुपाये ... जब हमने अपनों के लिए इतनी अभिरुचि बना ली है तो बाकी संसार के लिए हमारे ख़यालात कैसे होंगे इसका अंदाजा लगाया जा सकता है...मेरे प्रिय मित्रो अपनी अभिरुचि की एक कमीज़ तो शायद आप एक बार पा भी लें पर संबंधो में यह संभव नहीं है ...सचेत हो .....
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