कर्म और ईश्वर में बहूत ही गहरा सम्बन्ध है, क्या आपको ऐसा नहीं लगता ??
ज़रा सी गहराई में उतरेंगे तो इसका अहसास आप को जरूर होगा ..... पहले ईश्वर को पूजे की कर्म को ?
क्या यह सही नहीं है की ईश्वर का ही दूसरा नाम कर्म है..... कर्म शब्द को कुछ और हल्का करूँ क्या ... यह वही हमारे रोज़ के काम है जिसे हम करते है; इसका अर्थ तो यही हुआ ना की ईश्वर हमे रोज़ अपने करीब आने का मौका देते है बस हम इसे समझ नहीं पाते है और चल देते है अगरबत्ती लेकर... मेरे यार ज़रा एक दिन अपने दिल का कहना मान कर तो देखो जरूर कुछ सच से रूबरू हो जाओगे....
हम वही ज्यादातर वही करते है जो हमे सही लगता है .....
हम कभी कभी वो भी करते है जो दूसरो को सही लगता है ...
हम कभी कभी सही जानते हुए भी वो करते है जो हमे या दूसरो को सही लगता है.....
पर ऐसा क्यों ???? क्या यही सच है ???? या कुछ और भी है जो हम यातो जानते नहीं है या जानना नहीं चाहते है।
ज़रा सोचिये एक बार .... मुझे आप के कॉमेंट्स का इंतज़ार है.....
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