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Thursday, 24 December 2009

क्या आप हँसते है....

रोजाना ; आप हँसते है ... पर कितना ?.... क्या आप सोचते है ... पर कितना ? ... आप चलते है ... पर कीतना ?... आप झगड़ते है... पर कितना. ?.. आप प्यार पाते है ....पर कितना ?...आप प्यार देते है.... पर कितना ?...आप सच्चे है ... पर कितने ?.... आप झूठे है... पर कीतना ?....
ऐसे ही ना जाने कितने सवाल है जिनका सही जवाब ना तो हम ढूंढते है ना ही उन्हें ढूँढने की हमारी इच्छा है....
इसीलिए एक गलत अनुपात में हम सिमट कर रह गयी है हमारी ज़िंदगी .... है तो सब कुछ हमारी जिंदिगी में पर कुंजम कुंजम मतलब थोडा थोडा .....
क्या इसपर सोचा नहीं जाना चाहिए ????
अगर कुछ समय हम अपने इस व्यस्त जीवन से निकालकर खुद को ही दे दें तो कुछ बोझ हल्का तो हो सकता है पर कीतना यह तो हर व्यक्ति विशेष पर ही निर्भर करेगा ...
मै खुद भी एक भीढ़ का हिस्सा बन कर नहीं जीना चाहता हूँ और ना ही एक सामजिक प्राणी से इसकी उम्मीद करता हूँ ... कोई इन जरूरी कामों को निपटा कर मंजिल पर पहुंचेगा..... कोई मंजिल पर पहुँच कर इन्हें निपटायेगा .... और कोई इन्हें साथ ही साथ निपटाते हुए मंजिल पर पहुंचेगा ...
सभी को मेरी शुभकामनाएं .....

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