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Tuesday, 5 January 2010

विक्षिप्त

डरते हो मुझसे ... मै भी डरता हूँ ... है कुछ केमिकल लोचा .... आप ही की देन हूँ मै ॥ पर कसूरवार आप को नहीं मानता ... मेरी माँ जब मुझे गले लगा कर रोती है तो मै भी रोता हूँ पर क्यों .... ना जाने क्या क्या सुनती है वो मुझे ऐसी काया देकर पर मै समझ नहीं पता ॥ पर क्यों....
मै मानसिक रूप से विक्षिप्त हूँ...
मेरी हँसी पर ज़माना हँसता है .... पर मेरे आँसू पोछने वाला कोई नहीं है ....
कितना अच्छा होता की मेरे दादू भी एलियन होते .... या मुझे भी कोई प्रीती जिंटा प्यार करती पर क्या करू , मै कोई राकेश रोशन की फिल्म का किरदार तो हूँ नहीं .....
मै तो मानसिक रूप से विक्षिप्त हूँ.....
आप के तो बहुत से दोस्त होंगे ना ... पर मेरे नहीं ... आप का स्कूल होगा ....पर मेरा नहीं ...
मेरी दोस्त मेरी माँ और माँ के आँसू है ....
मेरे जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है पर जीना है ....
मै तन्हाई में जीवन गुजरता हूँ और तन्हाई में ही मर जाता हूँ....
मै मानसिक रूप से विक्षिप्त हूँ .....
मुझ में से कुछ ऐसे भी है जिनका कोई नहीं ... सड़क ... रेलवे प्लेटफोर्म ... ही उनका घर है .... और कूड़े का ढेर ही उनका खाना .... लोगो की गालिया ही प्यार के दो बोल है ... समझ तो वो पता नहीं ...
लोगो के खेलने की चीज़ है वो ... हंसने का एक जरिया है वो ....
माना वो तो मानसिक रूप से विक्षिप्त है
पर क्या आप भी .....

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