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Sunday, 3 January 2010

धारा और इंसान

मै धरती की धारा हूँ ... धरती मेरी माँ है ... मै धरती पर ही खेलती हूँ ... धरती पर ही जवान होती हूँ और एक दिन अपनी धरती माँ से दूर समुद्र की गोद में समां जाती हूँ ... यही मेरा जीवन है कई पड़ावों को पार करती हूँ, इस जीवन में मै ...कोई मुझे गंगा कहता है कोई मुझे यमुना ... कोई ब्रहमपुत्र तो कोई नर्मदा .... नाम तो अनेक है मेरे पर रूप एक है ... मै हूँ धरती माँ की बेटी और मै ही जीवनदायिनी हूँ .... मेरी कोख में भी है एक जीवन, जो है रंग बिरंगा तुम्हारा जीवन अधूरा है वायु बिना तो मेरा है जल बिना.....पर तुम तो इंसान हो ... तुम्हे क्या लेना देना मेरे जीवन से ... मेरे बच्चो को मुझ से ही चुरा कर ले जाते हो ... दो इंच की अपनी जीभ से मेरे बच्चो का स्वाद बताते हो ... पर तुम तो इंसान हो ...मेरे ही जल से अपनी प्यास मिटाते हो ... और मुझ ही में अपना मल मूत्र बहाते हो ... पर तुम तो इंसान हो...मुझे रोक रोक कर बाँध बनाते हो और अपनी उपजाऊ जमीन को बंज़र बनाते हो ... पर तुम तो इंसान हो ...ग्रंथो में मुझे अपनी माँ बताते हो और मुझमे ही अपनी अस्थिया बहाते हो ... पर तुम तो इंसान हो ...मेरे ही पानी से अपने कारखाने चलाते हो और मुझी में अपना विषैला रसायन मिलते हो ... पर तुम तो इंसान हो ....अपनी कहानी अब तुम से और क्या कहूँ ... तुम तो इंसान हो ....

1 comment:

  1. wow.. dear..aapne to bhot hi badhiya blog likha he..aapke in vicharo ko padh k apni naitikta aur apne samaj k pratti jimmedari ka aapne firse ehsaaas kara diya ..aisa hi kuch ise padhne k bad lag raha he..bhot badhiya ..keep it up...my dear.

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