यह क्या होता है यह तो शायद सब ही जानते होंगे . . .पिछले कुछ समय से यह बारम्बार विनाश का कारण भी बना हुआ है, भूगोलिक परिभाषा, भूगोलिक स्वरुप और भूगोलिक विनाश से भी हम सभी परिचित है पर क्यों ना आज हम इसके एक और नए स्वरुप के बारे में जाने . . आज मै जिस चक्रवात से आप को परिचित करवाने जा रहा हूँ, उससे शायद आज कोई भी परिवार अछूता नहीं है, यह है पारिवारिक चक्रवात . . . है ना सब का जाना पहचाना दोस्त . . . और हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग . . .सब पता है, इस topic में समय खराब करने जी जरुरत नहीं है . . . शायद आप को ऐसा भी लगे; पर मेरा मकसद आप का समय खराब करना नहीं है, बस आप का कुछ समय लेने का है .
उद्देश्य बदलते गए, आवश्यकताए बदलती गयी, ऊंची ऊंची इमारतो को निहारता हुआ आदमी अपने मूल से भटकता गया और अपने आप में ही सिमटता गया . . . "मै" वो कलयुग का यमराज है जिसने आज ज्यादातर लोगो को अपनी गिरफ्फ्त में ले लिया है . "हम" वो भगवान् है जो आज ईद का चाँद हो चुका है, सब को मै से ही प्यार है तो किया भी क्या जा सकता है . वैसे जब तक यह मै घर के बाहर था यह तरक्की की एक राह था, आज जब यह घर में आकर बैठ गया है यही नरक का द्वार हो गया है .माँ, बाप, भाई, बहन सब बट चुके है सभी अपने तर्कों का निर्माण करते है और सभी खुद ही उसका पालन करते है . . . निष्कर्ष क्या निकलता है वैचारिक विभाजन . . . कुछ समय बाद पारिवारिक विभाजन . . . उसके बाद बचता ही क्या है " मै और तनहा चार दिवारी " भौगोलिक चक्रवात से तो शायद बचने के लिए कई संस्थाए , सरकार लगी हुई है पर इस चक्रवात से कौन बचाएगा .
शायद जब तक इसका समय आएगा तब तक लहरे हमारे ऊपर पहुँच चुकी होंगी .
अब सवाल उठता है की क्या करू. . .
कर भी क्या सकते है . . . या जो भी होगा देखा जाएगा; यह कहने से काम नहीं चलेगा . . . यह विषय है विचार करने योग्य आप अपने सब से अच्छे विचारों से जो की वास्तविक हो, और अपनाए जाने योग्य हो और आपसी वैमनस्य , दूरियों को कम करने वाले हो उन्हें प्रचारित करे, और सोसल नेट्वर्किंग साईट्स के माध्यम इस विषय को एक ज्वलंत समस्या के रूप में मानते हुए इसके निवारण के लिए प्रयास करे यही मेरा एक सुझाव है ...आप के विचारों से अवगत कराये. . .
अब मशीनों के युग में उपजा यह चक्रवात मशीनों से ही ख़तम करना होगा . . . वरना सुनामी तो एक दिन में मौत देकर गयी थी . . . और इस सुनामी में सारी जिंदिगी मरना होगा. . .
सत्य मेव जयते . . .

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