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Sunday, 18 September 2011

विवाह ...

विवाह ...
भारतीय सभ्यता का एक अभिन्न अंग; क्यों किया जाये, किससे किया जाये, कब किया जाये, यह सब तो फ़िज़ूल की बाते है पर अवश्य किया जाये इस बात में दम है. समय दर समय गुज़रता गया पर इसकी चाहत में कोई कमी नहीं आयी प्रेम हो न हो पर प्रेम विवाह तो हो ही जाए, घर वाले मान जाए तो फिर बात ही क्या ...

एक बार विवाहित लड़की से जाकर पूछो की तेरे सीने में कितना दर्द है तो सारी उम्र गुज़र जायेगी पर उसका दर्द नहीं ख़तम होगा सारे गाँव सारे रिश्तेदार सारे मित्रो से वो अपनी दशा बया भी कर देगी तब भी इस दर्द से निजात ना मिलेगी ... ऐसा अटूट है यह रिश्ता ऐसा अटूट है यह बंधन ...

रही लड़के की बात तो यह प्रजाति तो शुरू से ही दबंग  टाइप की रही है खतरों से खेलना तो इनकी पुरानी आदत है पर यह खतरा इतना बड़ा है इसका आभास यह भी नहीं कर पाए वाह मेरे शेर वाह ...
अब आया वक़्त कहावतो को कहने का ...

शादी तो वह लड्डू है जो खाए वो पछताए जो ना खाए वो भी पछताए ...
ओखली में मुह डाला तो अब मूसलो से क्या डरना ....
अब पछताए क्या होत जब चिड़िया चुग गयी खेत ....

हमने जिंदिगी में जो कुछ भी लोगो की निगाह से छुपा कर के मेहनत से बचा कर के या चुरा कर के जमा कर के रखा  है उसका वारिस कौन होगा यह है इस रिश्ते की अहम् डोर है ... 

आज भी हमारे भारतीय समाज में एक अकेली लड़की का जीवन काफी कठिनाईयों से भरा होता है सारी जिंदिगी अकेले काटना आसान नहीं है उसका रखवाला होना जरूरी है यह इस रिश्ते की अहम् डोर है ...

शारीरिक सुख की स्थायी व्यस्था इस रिश्ते की अहम् डोर है ...

बुढापे में बेटा बेटी तो कम ही साथ दे पाते  है कारण कुछ भी हो समय की कमी हो या माँ बाप से दूरी या हो बीबी की ना पसंदगी ... ऐसे में बुढ़िया तो साथ निभाएगी ही या बुड्ढा तो साथ निभायेगा ही ...यह है इस रिश्ते की अहम् डोर ....

माँ शब्द की आवाज़ पिता की डांट बहन भाई की तकरार की चाहत यह है इस रिश्ते की अहम् डोर ...

मानव जीवन मिला है मानव सभ्यता को आगे बढ़ाना है एक अच्छा समाज बनाना है थोड़ी बहुत तकरार तो जायज़ है, व्यस्त जीवन शैली में भी भावनाओ को स्थान दीजिये ... 

इस अटूट बंधन को मजबूत बनाईये ...

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