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Monday, 21 December 2009

एक सुबह का इंतज़ार

वो एक पल जिसे कही ढूंढते है हम ..जिसका है हमे इंतज़ार... इसके आने के इंतज़ार में ना जाने कितनी राते हमने जागते जागते ही काट दी है... क्या वो आएगा ?? क्या एक सुबह ऐसी भी होगी जब सूरज की पहली किरण हमारे तन मन में एक ऐसी ज्योति जगा देगी की हम भी कह सकेंगे की यह सुबह मेरी है......
सोच सोच का फर्क है ....
यदि हमारी सोच सकारात्मक है तो हमे जरूर हर सुबह का बेसब्री से इंतज़ार होगा... नहीं तो हर रात आखिरी रात सी लगेगी ...
मेरे दोस्तों हमेशा नकारात्मक सोच से दूर रहना ....
शुभ्चितक .....

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