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Saturday, 18 December 2010

एक आम आदमी ....

बचपन कब आया कब चला गया पता भी नहीं चला हां कुछ यादें जरूर साथ लेकर हम चले आ रहे है जिससे उसे जीवित रखा जा सके ...
जवानी कब आई कब चली गयी पता भी नहीं चला हां कुछ सुनहरे पलों की यादे, कुछ कडवे अनुभव, मिलने और जुदा होने की बेला के अलावा बस मै ही तनहा बचा हूँ...

ढलती जवानी और निकट आता बुढापा, सुनने वाला कोई नहीं मेरी, अब तक जो मैंने किया उसका मूल्यांकन करेगा अब मेरा अपना परिवार और यह ज़माना , जो मै कर पाया वो तो मेरी जिमेदारी थी और जिसे मै नहीं कर पाया वो मेरी कमी ....
अब तो बस ऊपर वाले का सहारा है जब तक हूँ बस कट जाये मेरे लिए समय निकालने वाले तो पहले ही कम हो चुके है अब तो बस कुछ पुराने संगी साथी ही बचे है जो कुछ पल हमारे साथ बिता लेते है . जानता हूँ  की वह भी घरवालो की आँखों में खटकते है  पर जीना है तो उन्हें कैसे छोड़ दूँ .
सच तो सिर्फ़ इतना ही है बाकी तो सिर्फ़ लिबास है .
मै एक आम आदमी ....

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